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मध्य एशिया: एक पुल या एक खाई
- विनीत तिवारी
- 06 Jan, 2026
दिल्ली
मध्य एशिया में पाँच देश हैं। इन पाँच में से चार देश तुर्की भाषा बोलते हैं। ये हैं: उज़्बेकिस्तान, किर्गिज़स्तान, कज़ाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान। पाँचवाँ है ताजिकिस्तान, जहाँ फ़ारसी भाषा बोली जाती है। ये सभी देश 1991 में विघटन से पहले सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) का हिस्सा थे।
इन सभी देशों का भारत के साथ ऐतिहासिक रूप से अच्छा संबंध रहा है। परंतु भारत में विशेष रूप से इन देशों के बारे में बहुत कम जानकारी है। अब, उभरती वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में, ये देश अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गए हैं और अब उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
अजय पटनायक की पुस्तक "मध्य एशिया: भू-राजनीति, सुरक्षा और स्थिरता" इन देशों के इतिहास और बदलती विश्व परिस्थितियों में उनकी वर्तमान प्रासंगिकता की पड़ताल करती है। यह पुस्तक इन देशों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था और शेष विश्व के साथ उनके व्यापारिक संबंधों में गहराई से उतरती है। जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज (JAISS) ने 24 दिसंबर 2025 को एटक भवन, दिल्ली में लेखक की उपस्थिति में इस विषय पर एक चर्चा-गोष्ठी का आयोजन किया।
पुस्तक का परिचय देते हुए, जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अजय पटनायक ने कहा कि पुस्तक का पहला संस्करण 2016 में आया था, परंतु इस भौगोलिक क्षेत्र में तेज़ी से हो रहे बदलावों के मद्देनज़र इस दूसरे संस्करण को लाने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने कहा कि ये देश प्रारंभ में राष्ट्रवादी उत्साह के कारण पश्चिमी देशों और अमेरिका की ओर आकर्षित हुए थे, जिसका इस्तेमाल रूस के विरुद्ध किया गया।
सोवियत संघ के विघटन के बाद पश्चिम ने ऊर्जा कूटनीति पेश की। पहले तो यह आभास दिया गया कि पश्चिम उन नवगठित देशों की मदद करने का प्रयास कर रहा है, जिनके पास न तो प्रौद्योगिकी थी और न ही आर्थिक संसाधन। परंतु इस क्षेत्र में हो रहे विकास को बारीकी से देख रहे विद्वानों ने इसे स्पष्ट कर दिया था कि पश्चिम का इरादा इन देशों से रूस को अलग-थलग करने तथा दूसरी ओर इन देशों के प्राकृतिक संसाधनों का फ़ायदा उठाने का था।
इस प्रक्रिया को अबाधित और स्थायी बनाने के लिए, पश्चिम ने शासन-परिवर्तन की रणनीति अपनाई। उन्होंने उन सरकारों को गिरा दिया, जो उनके पक्ष में नहीं थीं और अपने अनुकूल शासन को सत्ता में लाया। यह यूगोस्लाविया, जॉर्जिया और फिर यूक्रेन में हुआ। गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और तथाकथित मानवाधिकार संगठनों का उपयोग करके, उन्होंने उन निर्वाचित सरकारों को बदनाम और अवैध ठहराया, जो उनकी शर्तों के आगे नहीं झुक रही थीं।
रूस को नियंत्रित और अलग-थलग करने की अगली चाल में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 9/11 की घटना और तथाकथित 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' का इस्तेमाल कर इन देशों में सैन्य अड्डे स्थापित किए। उन्होंने अपने सैन्य अड्डे स्थापित करने के लिए इन देशों को आकर्षक आर्थिक लाभ दिए। परिणामस्वरूप, उज़्बेकिस्तान में एक अमेरिकी वायु अड्डा और किर्गिज़स्तान में एक सैन्य अड्डा खोला गया। अमेरिका ने अज़रबैजान में सैन्य प्रशिक्षण और संयुक्त अभ्यास शुरू किए। इससे रूस सतर्क हो गया और पुतिन ने मध्य एशिया के बारे में अपनी रणनीति बदल दी।
अमेरिका सहित पश्चिम की रणनीति रूस को हर तरफ से नियंत्रित और सीमित करने की है। इसने क्रीमिया और यूक्रेन को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया और मध्य एशियाई देशों को अपने शिविर में खींचने का प्रयास किया, परंतु विफल रहा। समय के साथ, मध्य एशियाई देशों ने भी यह समझ लिया कि उनके हित पड़ोसी रूस के साथ बेहतर तरीके़ से सधते हैं। अमेरिका और पश्चिम रूस को अलग-थलग करने में विफल रहे और अब स्थिति यह है कि जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ देशों को छोड़कर चीन सहित संपूर्ण वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) रूस के समर्थन में है। अपनी भूमि पर अमेरिका के सैन्य और वायु अड्डों को हटाकर, इन देशों ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे अमेरिका और पश्चिम की लीक पर नहीं चलेंगे। ये सभी देश चीन के साथ भी अपना जुड़ाव बढ़ा रहे हैं। जिस तरह अमेरिका अफ़गानिस्तान से भागा, उससे मध्य एशियाई देशों में अमेरिका के प्रति अविश्वास पैदा हुआ। एक पड़ोसी के रूप में रूस की नियति मध्य एशियाई देशों से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ट्रम्प की अनिश्चित नीति ने भी पुस्तक में निष्कर्ष निकालना कठिन बना दिया। एक दिन ऐसा लगता था कि ट्रम्प रूस की ओर बढ़ रहे हैं और दूसरे दिन वे उसके ख़िलाफ़ और अधिक टैरिफ़ की घोषणा कर देते।
विषय पर टिप्पणी करते हुए, वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता ने कहा कि दुनिया की तेज़ी से बदलती राजनीतिक अर्थव्यवस्था भी विश्व की भू-राजनीति, सुरक्षा और स्थिरता तय कर रही है। चीन की प्रगति के साथ, यह समझना चाहिए कि केवल राजनीति प्रभावित नहीं हो रही, बल्कि अर्थशास्त्र भी बदल रहा है। पिछले तीन दशकों में वित्त की सर्वोच्चता से दुनिया को नुक़सान हुआ है और अमेरिका ने इसका आनंद उठाया है, परंतु अब चीन उत्पादन को प्राथमिकता पर वापस ला रहा है। चीन ने ब्रिक्स के सभी साझेदार देशों, जिनकी संख्या 150 से अधिक है, में गैस पाइपलाइन, रेल मार्ग, पुल और सड़कें बनाई हैं। इससे डॉलर का वर्चस्व रुक गया है। पश्चिम का पतन हो रहा है और राष्ट्रों के वैकल्पिक समूहों के तेज़ी से बढ़ने के कारण एक रिक्त स्थान बन गया है। ब्रिक्स का गठन, चीन की बेल्ट एंड रोड पहल, ALBA और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) एक ऐसा स्थान प्रदान कर रहे हैं, जहाँ अमेरिकी प्रभुत्व का स्थान परस्पर सहयोग और समन्वय ने ले लिया है। निस्संदेह, इन देशों में शासन व्यवस्था पूरी तरह से जन-पक्षधर नहीं है, परंतु यथार्थ स्थिति ने उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट होने के लिए मजबूर कर दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार और मध्य एवं पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ क़मर आग़ा ने कहा कि ये मध्य एशियाई देश अत्यंत उन्नत सभ्यताएँ रखते थे और पहले भारत के साथ व्यापार के माध्यम से अच्छी तरह जुड़े हुए थे। परंतु फिर इस क्षेत्र पर रूस के ज़ार ने कब्ज़ा कर लिया और वे लंबे समय तक रूसी वर्चस्व के अधीन रहे। उन पर अत्याचार हुए। उनकी भाषाओं को मार दिया गया और उन पर रूसी भाषा थोप दी गई। बाद में, सोवियत संघ के साथ, उन्हें फिर से फलने-फूलने का अवसर मिला। भू-राजनीतिक और ऐतिहासिक दोनों रूप से, ये देश रूस से जुड़े हुए हैं। परंतु इन देशों की स्थिति के बारे में कोई भी आकलन करते समय हमारे मन में एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। इन देशों की शासन व्यवस्थाएँ भ्रष्ट और जन-विरोधी हैं, बिल्कुल अरब देशों की शासन व्यवस्थाओं के समान। इन देशों के बीच सीमा विवाद भी बहुत अधिक हैं। ये देश खनिज संपदा से बहुत धनी हैं और गैस तथा तेल में समृद्ध हैं। प्राकृतिक संसाधनों के भंडार के कारण, ये देश इंग्लैंड और बाद में अमेरिका के साम्राज्यवादी शासनों की नज़र में रहे हैं। उन्होंने इसे 'ग्रेट गेम' कहा है और हमेशा इन भंडारों पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया है। पुस्तक इसकी विस्तार से चर्चा करती है। इस क्षेत्र के लिए अमेरिकी योजना रूस से अन्य सभी देशों को अलग-थलग करने की रही है। उन्होंने पहले ही इराक को नष्ट कर दिया है। ईरान को छोड़कर, पश्चिम एशियाई देशों के शासक पहले से ही उनके प्रभाव में काम कर रहे हैं। अमेरिका ईरान को घुटने टिकवाने का प्रयास कर रहा है। इसलिए, सभी तेल उत्पादक देश अमेरिका के निशाने पर हैं।
इसके विपरीत, रूस और ईरान रेल और सड़क मार्ग से इन मध्य एशियाई देशों को जोड़ने में बहुत सक्रिय हैं। वे अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण मार्ग का विकास कर रहे हैं, जो जल्द ही पूरा हो जाएगा और इन सभी देशों को ईरान के चाबहार बंदरगाह से बहुत बेहतर तरीके़ से जोड़ देगा। उन्होंने कहा कि जब भी कोई बड़ी शक्ति का पतन होता है, तो युद्ध होते हैं। साम्राज्य विनाश के बिना नहीं ढहते। परंतु इस बार, ब्रिक्स का उदय इस स्थिति को बदल सकता है। विकासशील राष्ट्रों का उदय और उनके आपसी हितों ने उन्हें एक साथ ला दिया है। अमेरिका इस एकजुटता को तोड़ने की लगातार कोशिश कर रहा है। मध्य एशियाई देश रूस और चीन के बीच स्थित हैं। यदि वे चीन और रूस दोनों के मित्र बन जाते हैं, तो वे एक पुल की तरह कार्य करेंगे। जबकि अमेरिका और पश्चिम उन्हें दो शत्रु देशों के बीच अलगाव की खाई के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। पुस्तक बहुत समृद्ध है और इन पहलुओं पर प्रकाश डालती है।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए, 'न्यू एज वीकली' के संपादक डॉ. भालचंद्र कानगो ने कहा कि ये देश ऐतिहासिक रूप से रूस पर निर्भर माने जाते हैं। परन्तु साथ ही इनमें इस्लाम का प्रभाव बढ़ रहा है। कज़ाख़िस्तान और आर्मेनिया के मध्य संघर्ष में, तुर्कमेनिस्तान ने खुले तौर पर कज़ाख़िस्तान का पक्ष लिया। यह भारत के लिए एक समस्या हो सकती है। मध्य एशिया में भारत का एकमात्र हवाई अड्डा ताजिकिस्तान में था, जो अब बंद है। उनके पास समुद्री बंदरगाह नहीं हैं। वे अफगानिस्तान और ईरान पर निर्भर हैं, और दोनों ही इस्लामिक देश हैं। ऐसी स्थिति में, भारत मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंधों को कैसे आगे बढ़ाएगा, यह देखे जाने की आवश्यकता है।
एक रोचक प्रश्न-उत्तर सत्र के बाद, कॉमरेड अमरजीत कौर ने जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट की ओर से श्रोताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि इस किताब में उठाए गए मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हैं और इन विचारों को और अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहिए।
इस बैठक में डॉ. दिनेश वार्ष्णेय, डॉ. ए. ए. खान, आचार्य येशी, अनिल चमड़िया, बबन कुमार सिंह, एस. के. राणा, विश्वदीपक, हरिओम शर्मा, निशा सिद्धू, प्रकाश सीजे, डॉ. संजीत डुडेजा, दीप्ति, हरीश बाला आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन विनीत तिवारी ने किया।
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